भारत में कैसे शूरुआत हुई पटाखा फोड़ने का चलन: चीन में बांस से शुरू हुआ था पटाखों का इतिहास, शैतान भगाने के लिए होता था इस्तेमाल, जानिए पूरी इतिहास

पटाखा का सफर: कल दिवाली है और दिवाली पर आतिशबाजी न हो भला हो सकता है क्या. बेशक पिछले कुछ साल से अलग-अलग राज्यों में प्रदूषण की वजह से पटाखों पर प्रतिबंध लगा दिया जाता हो, लेकिन लोग कोई न कोई जुगाड़ निकालकर पटाखे फोड़ते ही हैं.

इस बार भी ऐसा ही कुछ है. कुछ लोग इस बैन का विरोध करते हैं तो कुछ सही बताते हैं. पर सवाल ये उठता है कि आखिर दिवाली में पटाखों की एंट्री कब से हुई. क्योंकि दिवाली को भगवान राम के अयोध्या लौटने की खुशी में मनाने से जोड़कर देखा जाता है तो उस वक्त पटाखे थे नहीं. ऐसे में पटाखे ने कब इस त्योहार में और भारत में एंट्री ली, ये जानना बहुत जरूरी है. आज हम आपको इसी पर बताएंगे विस्तार से.

चीन से शुरू हुई पटाखे की कहानी

इतिहास के पन्नों को पलटकर देखें तो पता चलता है कि दुनिया के पटाखों से रूबरू कराने वाला चीन ही है. छठी से नौवीं शताब्दी के बीच टांग वंश के समय चीन में ही बारूद की खोज हुई. इतिहासकार बताते हैं कि पटाखे यानी आतिशबाजी की खोज चीन में ही हुई थी.

बारूद के मिलने से पहले भी आतिशबाजी

इतिहासकार बताते हैं कि बारूद और पटाखों से पहले भी लोगों को इनका शौक था. लोग तब इस शौक को नेचुरल तरीके से पूरा करते थे. बताया जाता है कि उस वक्त चीन के लोग बांस में आग लगाते थे और इसमें मौजूद एयर पॉकेट्स फूटने लगते थे. इससे आवाज आती और इस तरफ पटाखों का शौक बिना पटाखों के पूरा हो जाता. चीनी लोगों के बीच एक मान्यता है कि बांस में आग लगाने से बुरी शक्तियों का नाश होता है. धीरे-धीरे समय बीता और एक दिन चीन में एक शख्स ने बारूद में पोटेशियम नाइट्रेट, सल्फर और चारकोल मिलाकर इसे बांस के खोल में भरकर जलाया. इससे काफी धमाकेदार विस्फोट हुआ. धीरे-धीरे बांस की जगह कागज का इस्तेमाल होने लगा.

भारत में 1526 में हुई एंट्री

अब बात करें बारूद और पटाखों की भारत में एंट्री की तो यह यहां पर पानीपत की पहली लड़ाई के वक्त यानी 1526 के आसपास आया. तब इसे अपने साथ मुगल लेकर आए थे. इतिहासकार बताते हैं कि पानीपत की पहली लड़ाई उन युद्धों में से एक है जिसमें बारूद और तोप का इस्तेमाल हुआ. यही वजह थी कि बाबर के आगे इब्राहिम लोधी हार गया. भारत में बारूद आते ही आतिशबाजी भी शुरू होने लगी. शादी समारोह और उत्सवों में आतिशबाजी करने का चलन अकबर के समय शुरू हुआ था. उस वक्त बारूद काफी महंगा था, ऐसे में आतिशबाजी सिर्फ राजसी घरानों और अमीर लोगों के यहां होती थीं.

ऐसे पड़ा पटाखा नाम

अब तक आपने भारत में बारूद की एंट्री के बारे में जाना. अब जानते हैं कि आखिर इनका नाम पटाखा कैसे पड़ा. दरअसल, 19वीं सदी में एक मिट्टी की छोटी मटकी में बारुद भरकर पटाखा बनाने का ट्रेंड था. बारूद भरने के बाद उस मटकी को जमीन पर पटक कर फोड़ा जाता था, जिससे रोशनी और आवाज होती थी. अनुमान है कि इसी 'पटकने' के कारण इसका नाम 'पटाखा' पड़ा होगा.

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